इतिहास

सागर शहर का इतहास १६६० A.D. में जाता है और यह माना जाता है की उड़ान शाह जो निहाल सिह के वंशज थे उन्होंने एक छोटा सा किला बनवाया था जो परकोटा कहलाता है और आज शहर के अन्दर स्तिथ है | इसके बाद वर्तमान किला और एक इसकी दीवारों के तहत निपटान गोविंद राव पंडित , पेशवा के एक अधिकारी , द्वारा स्थापित किया गया था जब सागर पर पेशवा का शासन था |
1818 ईस्वी में , जिले के अधिक से अधिक हिस्सा पेशवा बाजीराव द्वितीय द्वारा सौंप दिया गया था ब्रिटिश सरकार को , जबकि के वर्तमान जिले के बाकी के विभिन्न भागों सागर 1818 और 1860 के बीच अलग अलग समय पर अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। बांदा तहसील के धामोनी परगना अप्पाजी भोंसला द्वारा 1818 ईस्वी में सौंप दिया गया था । राहतगढ़, गढ़ाकोटा , देवरी, गौरझावर और नहारमोऊ एकसाथ पांच महल के रूप में जाने जाते थे | यह सब सिंदिया के राजाओ द्वारा १८२० , १८२५ के बीच अंग्रेजो को सोप दिए गए | बाँदा का शाहगढ़ १८५७ के बाद अस्तित्व में आया |

प्रशासकीय दृष्टी से सागर और उसके आसपास के स्थान्नो में बहुत ज्यादा बदलाव करना पडा | सागर क्षेत्र को सबसे पहले बुंदेलखंड के राजनीतिक मामलों के अधीक्षक के प्रशासन में रखना पडा | बाद में १८२० में इसे गवर्नर जनरल के प्रशासन में रखा गया | उत्तर- पश्चिमी प्रांत 1835 में गठित किया गया था, सागर और नर्बदा शासित प्रदेशों में इस प्रांत में शामिल थे। १८४२ में गवर्नर जनरल को बुंदेलखंड की और ज्यादा ध्यान देने की बात की गयी | इसके बाद 1861 में सागर और नर्बदा प्रदेशों ,को नागपुर राज्य के साथ साथ एक आयुक्त के प्रांत में गठन किया गया |
सागर एक छोटी अवधी के लिए कमिश्नार का मुख्यालय रहा पर १८६३-६४ में इसे जबलपुर संभाग में ले लिया गया | १९३२ में दमोह सागर जिले में जोड़ा गया | पर बाद में इसे अलग जिला बना दिया गया | उस समय सागर में सिर्फ ४ ही तहसील थी , सागर , खुरई , रहली, और बन्दा |